
लखनऊ: इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने वर्ष 1999 के हत्या मामले में अहम फैसला सुनाते हुए चार आरोपियों को बरी कर दिया है। अदालत ने निचली अदालत की ओर से सुनाई गई उम्रकैद की सजा को निरस्त कर दिया। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ लगाए गए आरोपों को संदेह से परे साबित करने में विफल रहा। यह आदेश न्यायमूर्ति राजेश सिंह चौहान और न्यायमूर्ति सुभाष विद्यार्थी की खंडपीठ ने दोनों आपराधिक अपीलों पर सुनवाई के बाद दिया। मामले में दिनेश शुक्ला, राकेश शुक्ला, राजेश शुक्ला और जगदीश को आरोपी बनाया गया था। इन चारों को निचली अदालत ने हत्या के मामले में उम्रकैद की सजा सुनाई थी। आरोपियों ने इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। मामला सुल्तानपुर के कोतवाली नगर थाने में वर्ष 1999 में दर्ज मुकदमे से जुड़ा है। अभियोजन के अनुसार, एक मार्च 1999 को दिनेश शुक्ला अजय शुक्ला को अपने साथ ले गए थे। इसके बाद अजय गोली लगने से घायल अवस्था में मिले। उन्हें उपचार के लिए लखनऊ ले जाया गया, जहां दो मार्च 1999 को उनकी मृत्यु हो गई।
परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की कड़ी साबित नहीं कर सका अभियोजन
हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान मामले में पेश किए गए साक्ष्यों और निचली अदालत के फैसले पर विचार किया। अदालत ने कहा कि पूरा मामला परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित था और घटना का कोई प्रत्यक्षदर्शी नहीं था। ऐसे मामलों में दोषसिद्धि के लिए जरूरी है कि सभी परिस्थितियां आपस में जुड़ी हों और उनसे आरोपियों के दोषी होने का निष्कर्ष संदेह से परे निकले। अदालत ने पाया कि अभियोजन पक्ष परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की आवश्यक कड़ी स्थापित नहीं कर सका। इसके अलावा, अन्य आरोपियों के खिलाफ आपराधिक साजिश के आरोप को साबित करने के लिए भी स्वतंत्र साक्ष्य उपलब्ध नहीं थे।
खंडपीठ ने यह भी कहा कि निचली अदालत ने मामले के महत्वपूर्ण साक्ष्यों और पहलुओं पर उचित तरीके से विचार किए बिना दोषसिद्धि का फैसला सुनाया था। इन आधारों पर हाईकोर्ट ने दोनों आपराधिक अपीलों को स्वीकार कर लिया और निचली अदालत के फैसले को निरस्त कर दिया। अपीलकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता पूर्णेंदु चक्रवर्ती के साथ अधिवक्ता प्रवीण कुमार यादव और अतुल कृष्ण ने पक्ष रखा। हाईकोर्ट के फैसले के बाद दिनेश शुक्ला, राकेश शुक्ला, राजेश शुक्ला और जगदीश को मामले में लगाए गए संबंधित आरोपों से बरी कर दिया गया।